धूमधाम से मनाया गया सम्राट अशोक धम्म विजय दिवस।

 धूमधाम से मनाया गया सम्राट अशोक धम्म विजय दिवस। 


(रिपोर्ट - विनोद कुमार मौर्य/बृजेश कुमार सिंह/सोनभद्र)




सोनभद्र। जनपद के करमा ब्लाक अन्तर्गत ग्राम सभा मधुपुर में स्थित शंकर मिलन वाटिका में हर वर्ष की भांति इस वर्ष बड़े ही धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ सम्राट अशोक धम्म विजय दिवस मनाया गया। कार्यक्रम का आयोजन वरिष्ठ समाजसेवी राकेश कुमार जी के द्वारा किया गया तथा कार्यक्रम का संचालन धरम सिंह मौर्य के द्वारा किया गया वहीं संयोजक आलोक कुमार मौर्य व सह-संयोजक का निर्वहन सुनील कुमार जी के द्वारा किया गया। गौरतलब है कि सम्राट अशोक धम्म विजय दिवस (जिसे अशोक विजयादशमी भी कहा जाता है) कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक द्वारा शस्त्र त्यागकर बौद्ध धर्म और अहिंसा का मार्ग अपनाने की स्मृति में मनाया जाता है।



सम्राट अशोक महान के द्वारा बौद्ध धर्म और 'धम्म' का प्रसार पर चर्चा -




सम्राट अशोक महान उपगुप्त से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली और दिग्विजय के स्थान पर 'धम्म विजय' (नैतिकता और अहिंसा की विजय) की नीति अपनाई। उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए श्रीलंका भेजा। उन्होंने सीरिया, मिस्र, ग्रीस और मसिडोनिया जैसे पश्चिमी देशों में भी धर्म प्रचारक भेजे। उन्होंने भगवान बुद्ध की पवित्र अवशेषों से पूरे भारतवर्ष में 84,000 स्तूप और विहार बनवाए, जैसे सांची का स्तूप और सारनाथ का स्तूप।  कलिंग युद्ध के बाद शस्त्र त्यागकर सम्राट अशोक ने जनहित और लोक कल्याण के लिए कई कार्य किए।  व्यापार और आवागमन को सुगम व सुरक्षित बनाने के लिए उन्होंने अच्छी सड़कों का निर्माण करवाया। यात्रियों और पशुओं को धूप से बचाने के लिए सड़कों के दोनों किनारों पर बड़े पैमाने पर छायादार पेड़ लगवाए गए। यात्रियों और राहगीरों की प्यास बुझाने के लिए रास्तों में निश्चित दूरियों (जैसे प्रत्येक आठ कोस) पर कुएं खुदवाए गए। लंबी यात्रा करने वाले व्यापारियों और आम लोगों के ठहरने के लिए विश्राम गृह व धर्मशालाएं बनवाई गईं। मनुष्य और पशुओं दोनों के लिए निःशुल्क चिकित्सालय और औषधालय स्थापित किए गए। इसी समय सम्राट अशोक महान के नाम के आगे देवानामपिय तथा प्रियदर्शी जुड़ गया। इतिहास में दर्ज तथ्य बताते हैं कि सम्राट अशोक के शासनकाल को स्वर्णिम युग भी कहा गया। बताया जाता है कि उस काल में घरों में ताले नहीं लगाये जाते थे क्योंकि शासन कुछ इस तरह से चलाया गया कि उस दौर में चोरी-छिनैती तथा दुराचार जैसे चीजों पर पूर्णतया काबू पा लिया गया था लोग खुद ही जागरूक हो चुके थे। आज भी चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान द्वारा स्थापित स्तंभ को भारत के संविधान में राष्ट्रीय चिह्न के रूप में दर्ज किया गया है। 



इस दौरान राष्ट्रीय समानता दल के प्रदेश अध्यक्ष संजय दीप कुशवाहा, राकेश कुमार, जिला पंचायत सदस्य चुर्क मोहन कुशवाहा, धरम सिंह मौर्य, संजय मास्टर जी, बलिराम मास्टर जी, विजय कुमार मौर्य, एडवोकेट राजेंद्र प्रसाद जी, सभापति सिंह मौर्य, मीरा कुमारी, विभूति नारायण, रामनरायन, राजेन्द्र प्रसाद कुशवाहा, सिद्धार्थ सिंह पटेल, संजय सेठ सहित बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया।



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